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2Lacs Of Hindu Sikh Disappear From Afghanistan, Only 220 Families left

कहां गए अफगानिस्तान से लाखों हिन्दू और सिख? अब बचे 220

बिल्कुल दिन का उजाला था। काबुल शहर का सेंटर इलाका। जगतार सिंह लघमानी अपनी आयुर्वेदिक दुकान पर थे तभी एक आदमी आया। उसने चाकू निकाला और जगतार से कहा कि इस्लाम कबूल करो वरना गर्दन काट दी जाएगी। आसपास के लोगों और अन्य दुकानदारों ने जगतार की जान बचाई थी। यह वाकया इस महीने की शुरुआत में घटित हुआ था। यह अफगानिस्तान में महत्वहीन होते हिन्दू और सिखों पर बिल्कुल नया हमला है। भयानक रूप से रूढ़ीवादी यह मुस्लिम देश बढ़ते इस्लामिक विद्रोह की चपेट में है। इस वजह से देश भायानक आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है।
कभी इस मुल्क में अल्पसंख्यक फल-फूल रहे थे पर अब मुट्ठी भर हिन्दू और सिख परिवार यहां बचे हैं। ज्यादातर लोग अपनी जन्मभूमि की तरफ लौटने पर मजबूर हुए। इनका कहना है कि अफगानिस्तान में भेदभाव और असहिष्णुता चरम पर है।
जगतार सिंह ने कहा, 'हमलोग दिन की शुरुआत भय और अलगाव से करते हैं। यदि आप मुस्लिम नहीं हैं तो इनकी नजरों में आप इंसान नहीं हैं। मुझे नहीं पता कि क्या करूं और कहां जाऊं।' यह बात उन्होंने काबुल शहर के भीड-भाड़ वाले इलाके में स्थित अपनी छोटी सी दुकान पर कही। सदियों से हिन्दुओं और सिखों ने अफगानिस्तान के व्यापार में अहम भूमिका अदा की है। हालांकि आज की तारीख में ये दवाई और आयुर्वेदिक दुकानों के लिए जाने जाते हैं।

नैशनल काउंसिल ऑफ हिन्दू ऐंड सिख के चेयरमैन अवतार सिंह ने कहा, 'अब यहां 220 से भी कम हिन्दू और सिख परिवार बचे हैं। इसकी तुलना में 1992 में काबुल सरकार के गिरने से पहले यहां 220,000 हिन्दू-सिख थे। पहले पूरे अफगानिस्तान में हिन्दू और सिख फैले हुए थे। अब यह समुदाय मुख्य रूप से पूर्वी प्रांतों नांगरहार, गजनी और काबुल तक सीमित है।'

अफगानिस्तान मुस्लिम देश है। हालांकि अमेरिकी नेतृत्व में जब 2001 में तालिबान को खत्म किया गया तब यहां संविधान बना। संविधान के मुताबिक अल्पसंख्यकों को अधिकार मिले हैं लेकिन यह किताब से जमीन पर नहीं आ पाया। अल्पसंख्यक यहां अपनी धार्मिक गतिविधियों को अंजाम नहीं दे सकते।



अवतार सिंह ने कहा कि यहां तालिबान से भी बुरी स्थिति अल्पसंख्यकों की हो गई है। उन्होंने कहा कि इस्लामिक कानून थोप दिए गए हैं। अवतार सिंह ने कहा कि लोगों को सरेआम फांसी दी जाती है और लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी है। हिन्दू और सिख पीले कपड़े पहनते हैं ताकि सार्वजनिक स्थानों पर उनकी पहचान हो सके। अवतार सिंह ने कहा, 'पुराने दिन बहुत अच्छे थे जब हमारी पहचान अफगान की थी। हमें बाहरी नहीं माना जाता था।' उन्होंने यह बात काबुल में एक मंदिर में कही।

अवतार सिंह ने कहा, 'हमारी जमीन सरकार के मजबूत लोगों ने ले ली। सरकार के सिपहसालारों ने जमीन ले ली। हमलोग संकट में हैं। हमारा छोटा समुदाय हर दिन छोटा हो रहा है।' पिछले हफ्ते दर्जनों हिन्दू और सिख परिवार हेलमंड से बेदखल हुए। यहां तालिबान का वर्चस्व है। तालिबान ने इन परिवारों से एक महीने में 200,000 अफगानी की मांग की थी।

काबुल के बाहरी इलाके कलचा में तनाव की स्थिति है। यहां हिन्दुओं और सिखों के लिए ऊंची दीवार का एक श्मशान है। हाल के वर्षों में काबुल का विस्तार हुआ है। अब हिन्दुओं और सिखों के इस श्मशान का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। कलचा के एक मुस्लिम निवासी अहमद तिमोर ने कहा, 'जब ये शव जलाते हैं तो हमें बदबू आती है। हम नहीं चाहते कि यहां ऐसा हो।'

सिखों का कहना है कि लोकल मुस्लिम उनसे दुश्मन की तरह व्यवहार करते हैं। इनका कहना है कि उन्हें अब अंत्येष्टि के लिए पुलिस की सुरक्षा की जरूरत है। अवतार सिंह ने कहा कि जब वे शवों को जलाते हैं तो लोकल मुस्लिम ईंट और पत्थर फेंकने लगते हैं।