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No House On Rent For Muslim-Backward Caste At Delhi -NCR!

NCR में नहीं मिलता मुस्लिमों-दलितों को किराए पर घर !



A study on discrimination in urban housing rental preferences, to be published in a forthcoming issue of Economic and Political Weekly, shows high levels of exclusion of Dalits and Muslims in the five metropolitan areas of NCR.
The team of researchers, led by Prof S K Thorat, chairman of the Indian Council of Social Science Research, and comprising scholars such as Anuradha Banerjee, Vinod K Mishra and Firdaus Rizvi, covered attempts to get houses on rent in Delhi, Faridabad, Ghaziabad, Gurgaon and Noida between January and March 2012.
The methodologies included contacting the “home-providers” via telephone or meeting them face to face. In both the methodologies, the home-seekers had the same credentials but for their names that indicated their caste and religion.

tenants
The telephonic audit had a total of 1,469 home-seekers, 493 each bearing upper-caste Hindu, Dalits and Muslim names. While not one of the 493 high-caste home-seekers received a negative response, about 18 per cent of Dalits and 31 per cent of Muslims faced outright rejection, found the study. Together those receiving either a negative response or a positive one with conditions attached worked out to 41 per cent in the case of Dalits, and around 66 per cent for Muslims.
The face-to-face audit covered 198 home-seekers, with 66 high-caste Hindus, Dalits and Muslims each. While 97 per cent of upper-caste Hindus got a positive response, 44 per cent of Dalits and 61 per cent of Muslims faced rejection. Together those receiving either a negative response or a positive one with conditions attached worked out to 51 per cent in the case of Dalits, and 71 per cent for Muslims.
In other words, the chances of Dalits and Muslims finding a house fell in the case of face-to-face contact. It also means that a significant number of Dalits and Muslims have to spend much more to stay in accommodations in NCR than their upper-caste counterparts.
“This indicates a clear case of market failure,” says Thorat, “where even prosperity does not allow you to buy your way out of discrimination… The studies do reveal that Muslims are even worse off than Dalits as far as the rental housing market goes.”
“Non-monetary motive often prevails among landlords renting out houses,” says the study, which chose Delhi for the research as it is often considered amongst the most migrant-friendly and cosmopolitan cities in India.
“While about 18 per cent of Dalits faced outright refusal from upper-caste landlords due to their caste, 23 per cent of them did get houses on rent but with differential terms and condition such as high rents and other restrictions. In case of Muslims, about one-third of them faced outright refusal from the landlords due to their religion, another 35 per cent managed to get houses on rent but with differential terms and conditions.”
The study focused on identifying discrimination in the NCR areas from both the supply and demand ends. The demand side included Dalit and Muslim home-seekers facing unequal treatment; and the supply side included discrimination practised by the “house providers”, including landlords, real estate agents and brokers.
While the broad results were categorised as positive and negative, positive was further broken down into differential demands (in terms of rents and security).
Tenants rejected
After phone interaction:
Upper caste Hindus: 0%
Dalits: 18%
Muslims: 31%
After meeting:
Upper caste Hindus: 3%
Dalits: 44%
Muslims: 61%
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के अगले अंक में प्रकाशित होने वाले एक लेख, शहरों में किराएदारों को किराए पर घर देने में होने वाले भेदभाव, पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में दलितों और मुस्लिमों को काफी ज्यादा भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

प्रोफेसर एस.के.थोराट के नेतृत्व में रिसचर्स की एक टीम जिसमें अनुराधा बनर्जी, विनोद.के.मिश्रा और फिरदौस रिज़वी जैसे नामी स्कोलर्स शामिल हैं। इस टीम ने किराए पर घर देने में मकानमालिकों द्वारा दी जाने वाली प्राथमिकता के संबंध में विस्तृत अध्ययन किया। इस टीम ने दिल्ली, फरीदाबाद, गाज़ियाबाद, गुड़गांव और नोएडा में जनवरी 2012 से मार्च 2012 के बीच इस संबंधी रिसर्च किया।
रिसर्च की विधियों में किराए के लिए घर मुहैया कराने वाले लोगों से रिसर्च टीम के सदस्यों द्वारा टेलीफोन और आमने-सामने मिल कर की गई बातें शामिल हैं। रिसर्च के दोनों ही तरीकों में किराए के लिए गए घर की खोज करने वाले लोगों की अन्य योग्यता व सामाजिक-आर्थिक स्तर मिलती-जुलती बताई गई थी, लेकिन उनके नामों से उनकी जाति और धर्म का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था।

टेलीफोन के माध्यम से किए गए रिसर्च में कुल 1,469 किराए के लिए घर की तालाश करने वाले लोगों को शामिल किया गया। इन लोगों में सवर्ण हिंदू, मुस्लिम और दलित नामों वाले लोगों की तीन श्रेणियां बनाई गई थीं। हर श्रेणी में 493 नाम रखे गए थे।
रिसर्च के मुताबिक जहां सवर्ण हिंदू जाति से संबंध रखने वाले 493 नामों में से एक को भी मकानमालिकों द्वारा किराए पर घर देने से मना नहीं किया गया, वहीं करीब 18 फीसद दलितों और तकरीबन 31 फीसद मुस्लिमों को सीधे तौर पर इनकार कर दिया गया। रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि सूची के तकरीबन 41 फीसद दलितों और 66 फीसद मुस्लिमों को किराए पर घर देने के लिए मकानमालिकों द्वारा अतिरिक्त शर्तों की पेशकश की गई। 
आमने-सामने की मुलाकात में किराए के लिए घर की खोज करने वालों 198 लोगों को शामिल किया गया। इन 198 लोगों में सवर्ण हिंदू, मुस्लिम और दलित तीनों श्रेणियों के लोगों में हर एक श्रेणी में 66 लोग शामिल किए गए। एक ओर जहां 97 फीसद हिंदुओं को मकानमालिकों और प्रॉपर्टी डीलर्स द्वारा सकारात्मक जवाब मिला, वहीं 44 फीसद दलितों और 61 फीसद मुस्लिमों को सीधे तौर पर इनकार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा 51 फीसद दलितों और 71 फीसद मुस्लिमों को मकानमालिकों द्वारा अतिरिक्त शर्तों के आधार पर किराए पर अपना घर देने की पेशकश की गई।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आमने-सामने की मुलाकात द्वारा दलितों और मुस्लिमों को किराए पर अपने लिए घर की खोजने की स्थिति में सकारात्मक जवाब मिलने की उम्मीद बेहद कम पाई गई। इसके अलावा, रिसर्च में यह भी पाया गया कि किराए के घरों में रहने वाले दलितों और मुस्लिमों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा किराया चुकाना पड़ता है।
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के हवाले से प्रोफेसर थोराट ने बताया कि सर्वे में मिले आंकड़े साफ तौर पर यह बताते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दलितों और मुस्लिमों द्वारा अधिक मूल्य चुकाने की हालत में भी उनके साथ हो रहा भेदभाव बेहद गहरे तक कायम है। दलितों के मुकाबले मुस्लिमों की हालत ज्यादा बुरी है। प्रोफेसर थोराट ने कहा कि चूंकि दिल्ली और समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को देश के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रवासी लोगों के लिए बेहद सकारात्मक और दोस्ताना समझा जाता है, इसलिए रिसर्च टीम ने इस इलाके को अपने अध्ययन के लिए चुना। 
रिसर्च के आंकड़े इसलिए भी चौंकाने वाले हैं क्योंकि दिल्ली और इसके आसपास के इलाके को कॉस्मोपोलिटन माना जाता है। यहां की आबादी में देश के अलग-अलग कोनों से आए लोगों की अच्छी-खासी तादाद है। रिसर्च से साफ होता है कि दिल्ली में मकानमालिकों के बीच रुपये के अलावा और भी कई तरह का सामाजिक-धार्मिक भेदभाव हावी है। एक ओर जहां 18 फीसद दलितों को सवर्ण हिंदू मकानमालिकों द्वारा किराए पर घर देने से इनकार झेलना पड़ा, वहीं 23 फीसद दलितों को किराए पर घर तो मिला लेकिन उनके सामने अधिक किराए की मांग रखी गई। साथ-ही-साथ उनके आगे कई तरह की अन्य शर्तें भी रखी गईं। उनपर कई अतिरिक्त मनाही भी लगाई गईं।
सूची के तकरीबन एक-तिहाई मुस्लिमों को सीधे तौर पर अपने धर्म के कारण, या फिर यूं कहें कि मुसलमान होने के कारण मकानमालिकों के इनकार का सामना करना पड़ा। तकरीबन 35 फीसद मुस्लिमों को किराए पर घर तो मिल गया लेकिन इसके लिए उन्हें मकानमालिकों द्वारा रखी गईं कई तरह की अतिरिक्त मांगें और शर्तें पूरी करनी पड़ीं।
भेदभाव की यह तस्वीर सिर्फ मकानमालिकों के साथ ही दिखी हो ऐसा नहीं है। बोकर्स और प्रॉपर्टी डीलर्स के पास भी दलितों और मुस्लिमों को इसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा।

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